हम बंद कमरो में छुप कर बैठे
सूरज हमको ढूंढ रहा है
सुबह तो देखा था
सड़को पर एक भीड़ जा रही थी
पता नहीं किस ओर
ना कोई छोर
में उसे ही ढूंढ रहा हू
लगा था मुझे वो मुझसे मिलने आये हैं
शायद मेरे ना होने से रात भर , आँखे भर आई होंगी उनकी
सो दौडे चले चले जा रहे हैं सुबह सुबह
में ढूँढता रहा पिछले चार घन्टे से
पूरब से निकल कर
आधा सफर पूरा कर
पर नहीं मिला कोई मुझे
कोई मटका नहीं हैं न कोई छावं
यही हे शहर अच्छा था गॉव
किसी ने बताया कि लोग कही छुपे बैठे हैं
नकली बर्फीली चादर ओढे
मुझे मुह छिड़ा रहे हैं
पेड़ जिन्दा है
खड़ी हैं वहां ऊंची इमारतें
कंक्रीट के जंगल हैं
आज भी हिमालय ली वादियों में सुकून मिलता है
में भटकुंगा पूरी शिद्दत से उन्ही वादियों में
बर्फ पिघलेगी तो कहर बरपेगा नदियों में
वो याद दिलाएंगी इंसान को कर्मो की सजा
मेरे आने से इतनी दिक्कत
लो बंद ठन्डे कमरो मजा
मेरे पेड़ जो लहलहाते थे
छाँव देते थे मुसाफिरों को
इन इमारतों में छावं भी नहीं मिलती
इनका गिर जाना ही बेहतर हें
सूरज चमक रहा है गरज रहा है
सूरज हमको ढूंढ रहा है