आज लिखने का मन में बिचार आया। लेकिन क्या लिखू ? किस टॉपिक पर लिखू ? राजनीति पर लिखने का मन नहीं है और मन है कि कुछ कहना चाहता है। पिछले दिनों में बहुत सी यात्राये की हैं तो ये तय हुआ है कि अनुभव साझा किये जाएँ।
पिछले दिनों बिहार में नालंदा जाने का दो बार मौका मिला। हमेशा से मेरे मन में यहाँ आने कि बड़ी इच्छा थी. बचपन से इसके बारे में पड़ा था। टेक्स्ट बुक्स में आपने भी पड़ा होगा इसलिए यहाँ इस डिस्कशन में नहीं जाते हैं। में तो झूठ कि तलाश में निकला था। अपना अपना सच तो सब को पता ही होता है. पटना से निकलते बकत मन में जिस पवित्र भावना ने जन्म लिया वो पटना से बाहर निकलते ही चिड़चिड़ाहट में बदल गयी। टूटी सड़क और लम्बे ट्रैफिक जाम ने मन को कचोट लिया। ऊपर वाले का नाम लेकर वो चार घंटे कैसे बीते ये तो आप भी समझ ही सकते हैं। बखितयारपुर से आगे रास्ता ठीक था।
नालंदा बिहार का एक जिला है , ये एक सच है। जिले का पूरा प्रशाशन बिहार शरीफ से चलता है। जो कि नालंदा से १० किलोमीटर पहले पड़ता है. दरअसल नालंदा एक गाव है, जिसके हिस्से में कुछ आया है तो बस इतिहास के पन्ने जो उसके नाम से जुड़े है. सरकार ने नालंदा यूनिवर्सिटी को पुनर्स्थापित करने का जो प्लान बनाया वो भी नालंदा में नहीं, राजगीर में शिफ्ट हो गया।
फ़िलहाल हम अब नालंदा के प्रवेश द्वार पर थे। टिकट लेकर एंट्री कि तो गाइड़ कहने लगा , कि अगर गाइड नहीं करोगे तो अंदर कुछ समझ नहीं आएगा। हमने गाइड साथ लिया और चल दिए। गाइड को अच्छी जानकारी थी उसने हमें अच्छे से समझाया। जब हम लाइब्रेरी के सामने पहुचे जो कि वो साईट है जो हम सब ने तस्बीरों में देखा है , गाइड ने कहा अब आप घूमो मेरा काम ख़तम हो गया। हम कहाँ मानने वाले थे अभी तो २० प्रतिशत ही घूमा था तो उसे जाने देने का तो सवाल ही नहीं था। बेचारे को हमें थोडा समय और देना पड़ा। उसकी शकल बता रही थी कि गलत लोगो के साथ फस गया।
वहाँ ताईबान से बौद्ध यात्रियों का एक ग्रुप आया हुआ था। वो बहुत ही श्रध्दा भाव से पूजन और ध्यान कर रहे थे, और वहाँ लगे सिक्यूरिटी गॉर्ड इशारे से यात्रियो को जगह जगह रुपये चढ़ाने को उकसा रहे थे. कुछ को यत्रियो ने रूपये भी दिए जिसे झट से जेब में रख लिया। ऐसा लगा जैसे हम किसी ऐतिहासिक स्थान पर नहीं किसी सड़क पर हो। वो गॉर्ड बहुत लाचार लग रहे थे , जो कुछ पैसो के लिए अपने और अपने देश के सम्मान को ठेस पंहुचा रहे थे।
नालंदा कि ऐतिहासिकता और सौंदर्य कि तारीफ करते हुए अब बापस चल पड़े। बाहर आते ही पार्किंग वाला स्लिप लेकर आ गया, २० रूपये दो। हमने कहा तुम कहाँ थे जब हम पार्क कर रहे थे , आपको स्लिप तभी देनी थी ना. वो क्यों मानने वाला था। उसे २० रूपये दिए गये और स्लिप प्राप्त की जिस पर लिखे १० रूपये को ब्लैक इंक से मिटा दिया गया था।
जब गए थे तो आना तो था ही. फिर ट्रैफिक जाम. रात को ३ बजे आखिर पटना अपने होटल में पहुच ही गये।
मैंने पहले भी कहा था कि इस ब्लॉग में आपको नालंदा के बारे में हिस्ट्री नहीं बताने जा रहा हूँ , में बस वो कहने कि कोशिश कर रहा हूँ जो काश झूठ होता।
नालंदा बिहार का एक जिला है , ये एक सच है। जिले का पूरा प्रशाशन बिहार शरीफ से चलता है। जो कि नालंदा से १० किलोमीटर पहले पड़ता है. दरअसल नालंदा एक गाव है, जिसके हिस्से में कुछ आया है तो बस इतिहास के पन्ने जो उसके नाम से जुड़े है. सरकार ने नालंदा यूनिवर्सिटी को पुनर्स्थापित करने का जो प्लान बनाया वो भी नालंदा में नहीं, राजगीर में शिफ्ट हो गया।
फ़िलहाल हम अब नालंदा के प्रवेश द्वार पर थे। टिकट लेकर एंट्री कि तो गाइड़ कहने लगा , कि अगर गाइड नहीं करोगे तो अंदर कुछ समझ नहीं आएगा। हमने गाइड साथ लिया और चल दिए। गाइड को अच्छी जानकारी थी उसने हमें अच्छे से समझाया। जब हम लाइब्रेरी के सामने पहुचे जो कि वो साईट है जो हम सब ने तस्बीरों में देखा है , गाइड ने कहा अब आप घूमो मेरा काम ख़तम हो गया। हम कहाँ मानने वाले थे अभी तो २० प्रतिशत ही घूमा था तो उसे जाने देने का तो सवाल ही नहीं था। बेचारे को हमें थोडा समय और देना पड़ा। उसकी शकल बता रही थी कि गलत लोगो के साथ फस गया।
वहाँ ताईबान से बौद्ध यात्रियों का एक ग्रुप आया हुआ था। वो बहुत ही श्रध्दा भाव से पूजन और ध्यान कर रहे थे, और वहाँ लगे सिक्यूरिटी गॉर्ड इशारे से यात्रियो को जगह जगह रुपये चढ़ाने को उकसा रहे थे. कुछ को यत्रियो ने रूपये भी दिए जिसे झट से जेब में रख लिया। ऐसा लगा जैसे हम किसी ऐतिहासिक स्थान पर नहीं किसी सड़क पर हो। वो गॉर्ड बहुत लाचार लग रहे थे , जो कुछ पैसो के लिए अपने और अपने देश के सम्मान को ठेस पंहुचा रहे थे।
नालंदा कि ऐतिहासिकता और सौंदर्य कि तारीफ करते हुए अब बापस चल पड़े। बाहर आते ही पार्किंग वाला स्लिप लेकर आ गया, २० रूपये दो। हमने कहा तुम कहाँ थे जब हम पार्क कर रहे थे , आपको स्लिप तभी देनी थी ना. वो क्यों मानने वाला था। उसे २० रूपये दिए गये और स्लिप प्राप्त की जिस पर लिखे १० रूपये को ब्लैक इंक से मिटा दिया गया था।
जब गए थे तो आना तो था ही. फिर ट्रैफिक जाम. रात को ३ बजे आखिर पटना अपने होटल में पहुच ही गये।
मैंने पहले भी कहा था कि इस ब्लॉग में आपको नालंदा के बारे में हिस्ट्री नहीं बताने जा रहा हूँ , में बस वो कहने कि कोशिश कर रहा हूँ जो काश झूठ होता।
Very good ........I like your style sirji
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