Sunday, March 22, 2015

सूरज हमको ढूंढ रहा है

हम बंद कमरो में छुप कर बैठे 
सूरज  हमको  ढूंढ  रहा  है

सुबह तो देखा था 
सड़को पर एक भीड़ जा रही थी 
पता नहीं किस ओर 
ना कोई छोर 
में उसे ही ढूंढ रहा हू 

लगा था मुझे वो मुझसे मिलने आये हैं 
शायद मेरे ना होने से रात भर , आँखे भर आई  होंगी उनकी 
सो दौडे चले चले जा रहे हैं सुबह सुबह 
में  ढूँढता रहा पिछले चार घन्टे से 
पूरब  से निकल कर 
आधा सफर पूरा कर 
पर नहीं  मिला  कोई मुझे 

कोई मटका नहीं हैं न कोई छावं 
यही  हे शहर  अच्छा था गॉव 
किसी  ने  बताया कि लोग कही छुपे बैठे हैं 
नकली बर्फीली चादर ओढे 
मुझे मुह छिड़ा रहे हैं

पेड़ जिन्दा है 
खड़ी हैं वहां ऊंची इमारतें 
कंक्रीट के जंगल हैं 
आज भी हिमालय ली वादियों में सुकून मिलता  है 
में भटकुंगा पूरी शिद्दत से उन्ही वादियों में 
बर्फ पिघलेगी  तो कहर बरपेगा नदियों में                     
वो याद दिलाएंगी इंसान को कर्मो की सजा 
मेरे आने से इतनी दिक्कत 
लो बंद ठन्डे कमरो मजा 
मेरे पेड़ जो लहलहाते थे 
छाँव  देते थे मुसाफिरों को 
इन इमारतों में छावं  भी नहीं मिलती 
इनका  गिर जाना ही बेहतर हें 
सूरज चमक रहा है गरज रहा है 
सूरज  हमको  ढूंढ  रहा  है 







No comments:

Post a Comment